Poetry

Diary from Turkey

 

The nails of this city are very long

Nailed even the door of God

And I fear its sharpness

Seated near the glass window having fish

See the nail wounds in the chest

The fish at my table became alive

Sat at a table nearby  drinking soup

 

I come out on to the road in search of that dog

Who will narrate to me stories of people dead

 

This city like one big intestine

Sometimes goes down and sometimes rises

And catapults you directly into the sky

The teeth of the city are nothing less

Which after chewing spits out

 

Behind my closed window

This unknown city unfolds like a crab

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The city that didn’t speak your tongue

Which one could understand even while asleep

The sound of the tongue clicking on the palate

Coming through the lips like a whistle

Leaving you feeling lonely

In a matter of seconds the city turns into a jungle

And people begin plucking leaves from the tree

 

The tongue is not your maid

Who swims in your ear like a fish

The history of centuries

Ground on the millstone

To a fine paste like chutney

Savoured with bread

 

 

For months now I have been living without my language

I fear my words don’t pull over a sheet and sleep off coffined

And will be left behind without a language

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What is there to worry if you built your wall on the wall of my faith?

What would happen if you drew a few lines across my painting?

It‘s all good, as my Lord found an excuse to chat with your God

When two lords meet

The tension in the city is bound to decrease

(On seeing the church and mosque together at  Hagia- Sophia)

 

At last the teeth of the city

Have left me and moved forward

 

Oh God! Is this the city where the sun has disappeared into its lanes?

While conquering the heights

Does it really even matter if you have lived for a life time?

Is there anyone here you can call your own?

 

The city is only Esquichire

Where love melts in the air

And moon hangs on the bridge

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They drove a nail on the head

Accepting oneself as a slave

The second nail strengthened their faith

 

By four nails they became the richest people in the city

 

The sixth nail drew them closer to God

Oh God, How great your wonders

Your blue umbrella strewn over their heads

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In the intestine of this city

Remains things still undigested

 

Like a python

Devouring both humans and humanity

 

Having sown the seeds

Beneath the foundation of another

And when the tree sprouted

Called it their own

 

Where sky is the limit for you and me

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While leaving a city

The feeling of loss is inevitable

I had lost myself on the lines drawn on paper from your canvas

 

And now will forever remember you

With a feeling of loss.

 

 

विश्व रचियेता की माँ
गोबर को मिट्टी में सानती वह औरत

तपती धरती पर छन्नछन्न नाचती बरसात से
बनी है

गोबर के मिश्रण पर दोनों ह्थेलियों को चलाती वह
धूप से बनी है, बरसात के कोरों से निकली धूप से

कण्डों पर चित्रकारी करती वह औरत, सिर्फ अपने से उपजी है
और उससे उपजा वह शिल्पी

जिसने दुनिया रची है

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दरख्तों को ईश्वर की भाषा मालूम है, वे जरा सा बादल उचका
बतिया लेते हैं ईश्वर से, घन्टों घण्टों

कभी कभी कौए भी शामिल हो जाते हैं उनकी बातों में
चोंच में पूर्वजों के लिये खीर भर

उनकी महफिल में शामिल होने को काले चींटे चल पड़ते है
तनों पर, चिड़ियों को बतियाने का वक्त नहीं होता

कैंचुओं और चींटियों को ईश्वर की जरूरत नहीं होती
वे खुश रहते हैं दरख्तों की जड़ों में

चींटियाँ किस्से लाती हैं आदमी के घरों से,
चावल और चीनी के दानों के साथ

दानों को भण्डार मे रख कर, वे आराम से
किस्सों की पोटली खोलती हैं

एक दिन ईश्वर की नजर पड़ी उस पोटली पर
बस तभी से चींटी और ईश्वर की ठन गई,

ईश्वर अब भी आता हैं दरख्तों से बतियाने,लेकिन
उसकी निगाह अब पोटली पर होती है

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दूर से देखने पर सीमाएं
गड्डमड्ड हो जाती हैं,
दुख और वेदनाएँ भी,
वेन्जुएला का कलाकार एरिक
कहता है‍ -“माँ ने फोन पर बतलाया कि
हम लोग बस एक बार रोटी खा पाते है,
फिर थका सा बोलता है‍-
“दुनिया में सबसे ज्यादा खनिज वाला देश है मेरा,
उसकी वेदना मुस्कान सी दोनों कोरों में खिंच जाती है.
ब्राजील का गायक काडु,
बीच- बीच में सिसकता हैं- देश याद आता है
हालांकि दम घुटता है वहां मेरा
फिर भी पीछा नहीं छोड़ता हैं मेरा देश
और वह अफगानी शरणार्थी
” देश तो देश है जी, लेकिन अब जाना नहीं ”
बड़ी गड्डमड्ड हो जाती हैं देश की सीमाएँ
जब तुर्क में सीरियन अभय पाते हैं
और जर्मनी के सारी फलों की दूकान
तुर्क चलाते हैं,
पैसंठ साल की कड़क ब्रेटा
अपने जर्मन रक्त के प्रति बेहद सतर्क
घर की सफाई के वक्त अपनी तानाशाही
दिखाना नहीं भूलती,
लेकिन जब खिड़कियों के परदे सरका
सूरज को भीतर आने की जगह देती है
तो बड़ी अपनी लगती है
उसके इतालवी पति, अमेरिकन नाती पोते
उसके भीतर के जर्मन को मिटा नहीं पाते
दूखी है, फरनान्दो,
देश के भीतर ही फसाद मचाए बैठे
हिंसक गुरिल्लों से भग्न शान्ति वार्ता के तहत
अपनी यादों में से केवल भय और अतंक को
हटाने की एक बार की गई कोशिश के भंग होने से
और मैं माप सकती हूँ वह दर्द , क्यों कि मैंने
दूकानों पर सरिये जड़े देखें हैं
सिरों से फुटबाल खेले जाने की
कथाएं सुनी है,मेडिलिन की पहाड़ियों पर
टिन के हजारों लाखों घरोन्दे देखे
बारह साल की माताओं की कमर पर लटके
नाजायज बच्चे देखे हैं
दूर से देख रही हूँ मैं
रक्त के बढ़ते तापमान को नापते हुए
मैं युद्ध के बारे में नहीं
खण्डहरों में दबे बच्चों को,
नष्ट अस्पतालों, भूखे बिलबिलाते बूढ़े बच्चों को
दूसरे के देश में रहते सहमें चेहरों को
फुसफुसा कर सवाल करती हूँ अपने से
युद्ध देश को , देश रहने ही कब देगा?
दूर से देखने पर नफरतें
परिणाम बताने लगती हैं
दूर से देखने पर सीमाएं
गड्डमड्ड हो जाती हैं,
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बस इतना ही करना है
किसी नए शहर में पैठने के लिए,
कोई नई गली पकड़ कर
कोई पगडन्डी की राह थाम,
खरामा खरामा चल देना है

करना इतना ही है कि
गन्तव्य को भूल कर
गलियों के मोड़ों के साथ
घूमते जाना है

रास्ते में उग आई
हर पदचाप को परखना है
हर पात से बात करना है
पतझड़ के रंगं को
भीतर तक उतरने देना है

जब तक कि हरे पीले रंगों को भूल
लाल भूरे रंग ना
ना अंग लगा ले तुम्हें

बस इतना ही करना है कि
हर नुक्कड़, हर छोटी सी दूकान से
उसकी कहानी सुन लेना है
ना जाने कब कोई घुसपैठिया
उनमें पैठ कर ले
और हम रंगो को ही स्वाद समझ लें

करना इतना भी है कि
किसी ट्राम में बैठ, उसके आखिरी
स्टेशन तक चलने का मन मनाना है
फिर आखिरी से एक पहले स्टेशन पर उतर कर
हवा को घूँट घूँट पीते हुए
किसी गलत बस को पकड़
शहर का चक्कर लगाते हुए
लौट आना है

इतना ही तो करना है
एक नये शहर को किसी गीली
ठण्डक में शाल सा ओढ़ने के लिए

भ्रमण के हिज्जों को याद करने के लिए

 
डाकाउ यातना घर#

डाकाउ यातनाघर के बाहर नोटिस पर लिखा है
कृपया कुत्ते साथना लेजायें

और बच्चेभी,

लिखा तो यह भी था कि
कृपया शोर ना मचायें, जोर सेना हंसे
ऐसा कुछ ना करें कि मृतकों कीआत्मा को
कष्ट मिले,

लेकिन व्यक्तिगत सामानवाली लाइब्रेरी में
कैदियों के सामान में खूबसूरत प्रेमिकाओं की तस्वीरों के साथ
बच्चोंऔर पालतू कुत्तो की भी तस्वीरे हैं
कैम्प में सन्नाटा है, सैंकड़ों दर्शनार्थियों के बावजूद
मानों किअभी कोई ना कोई मृतात्मा बोल उठेगी

यदि कोई बच्चा होता तो मौत की नाक पर उंगली रखकर हंस देता
और हंस देती उसके साथ राखके बगीचे मे सोती मृतात्माएं

मृतकों की राख को मैंने चित्तौड़गड़ में देखा हैं
जहाँ सैंकड़ोंऔरतों ने युद्ध में गए पुरुषों के पीछे आत्मजौहर कियाथा

और यहाँ ,डाकाउ में , जहाँ सैंकड़ों कैदियोंको
गैस चैम्बरों में जलाया गया

युद्ध मौत को क्रूर बनाता है
हालांकि मौत स्वयं में उतनी क्रूर भी नहीं है

चर्च के घन्टे भी शान्त हैं, यहूदी पूजाघर बिल्कुल मौन है

आदमी किससे भयभीत है?
मौत से या मौत देनेके तरीके से

वे निरीहआत्माएं ,जो देह केभीतर रहती हुई कुछ नहीं कर पाई
देह के राख बनने पर इतनी भयदायिनी कैसे बनगई?

भय जरूरी है
अपने से
अपने क्रोध से
नाखूनों के तीखेपन से

लेकिन सबसे ज्यादा
दूसरों को दबाने से मिलने वाले आनन्द से

मौत को अन्त समझने की भूलसे

मैं जर्मनी के इस इलाकें से गुजरती हुई
पूरे कि पूरे शहर के यातनाघर में बदलने वाली तस्वीरों को
शायद ज्यादा गौर से देख पाऊँ

दुनिया के तमाम अल्लेप्पों में मण्डराती रुहों से सम्वाद कर सकूँ

किसी भी यातनागृह से गुजरना
आदमी होने की यात्रा से गुजरना होता है
और थोड़ा और आदमी होने की कोशिश भी होती है

लेकिन क्याआदमी कोआदमी बनाने केलिए
यातनाघर जरूरी हैं?

सवालअधूरा है

और मेरी कविता भी,,,,,
#म्यूनिखकाकुप्रसिद्धकन्सर्ट्रेशनकैम्प

By Rati Saxena

Translated by Angelina Bong

 

बचा के रखती थी माँ

 

चींटियाँ

 

 

आखिर बचता क्या है?

 

आखिर बचता क्या है?

उंगलियों के पौरो पर घिसे से कुछ निशान,

हथेलियों की उलट पर सैंकड़ौं झुर्रियाँ ,

या फिर कुछ कलहें, कुछ किस्से

या फिर सब कुछ को एक रात अचानक छोड़

बूढ़ा बच्चा बन जाना?

 

बिल्कुल वैसे ही , जैसे कि

पिता बन गये थे बच्चे, एक दिन अचानक

एक ऐसे बच्चे जिसके सपने में परियाँ नहीं आतीं,

एक ऐसे बच्चे , जिसके पैरों में चकरी आ बैठी

एक ऐसे बच्चे , जिसके हाथ माथे को तबले सा बजाते

 

पिता जो एक पहाड़ थे, जिसके नीचे हम

बरसाती रातों में अभय पाते

पिता जो एक दहाड़ थे, जो सोते में भी

हमारी नसों को में खलबली मचा देती

पिता जो एक दीवार थे, जो हर बाहरी तूफान को

भी तरह आने से रोकते थे

 

 

वे पिता ही अपनी देह में शरणार्थी बन

एक हठीले बच्चे से दिन रात दौड़ने लगे

अपनी  जिया के लिये मचलने लगे

कच्चे फलों मे मुँह मारने लगे

 

जितना एक बच्चे के बचपन को

महसूस करना  सुखद होता है

उतना ही दुखद होता है

पिता के पितृत्व का भड़भड़ा कर टूटना,

और किरच किरच बन बिखर जाना

 

आखिर बचता क्या है?

आखिरी पंक्ति का आखिरी शब्द?

निस्तब्धता से पहले आखिरी हिचकी?

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नागरिकता

वह उतारने लगा, एक के बाद एक

अपनी छत के  ऊपर टंगा नन्हा सा आकाश

 

खिड़की में जबरदस्ती घुसा धूप का टुकड़ा

अपनी गली के मुहाने पर खड़ी टिन की दूकान

 

वह उतारने लगा अलगनी में टंगा गुलाबी कपड़ा

रसोई के तन्दूर से गेंहूँ की सुगंध,

 

वह चलने लगा, दौड़ने लगा, तैरने लगा

और इसी गति में उतारता गया

 

और जब उसके तलवे जमीन से टकराये तो

 

तम्बू की तरह तने उस आसमान में कई छेद तो दिखे,

नहीं था तो बस, उसका अपना वाला आकाश,

टिन की टिनटिनाहट, पकते गेंहूं की गंध

 

यहीं वह समझ पाया कि वह

अपनी नागरिकता खो बैठा है…..

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Citizenship

he started taking down the one after another

small pieces of skies  from his roof top

 

a  piece of sunlight , which entered forcefully from the window

and the tin shop standing in the corner the lane

 

he started taking down the pink cloth hanging on cloth line

the aroma of wheat from the oven

 

he started waking, he stated running, swimming

and when his soles touched the earth

 

he could see so many holes on the sky like tent top

though his own sky was missing

sound of tin, and the aroma of the baking wheat

 

now he could understood that

he lost his own citizenship

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भूलना एक खूबसूरत वरदान है,

भूलना एक खूबसूरत वरदान है, पिता भी इस बात को मानते थे,
वे इसलिये भी मानते थे कि उनके अंग्रेज टीचर मानते थे,
मैं भूलती हूं कि इन अनजान शहर में अनजान
टैक्सी ड्राइवर ने मुझे बीच रास्ते पर उतार दिया
मैं भूलती हूँ कि अपने ही भाषा के कुछ कमजोर लोगों ने
मुझ पर कंकड़ फैंका. अपनी खोह में छिपे छिपे
भूलती हूँ तुझे भी ओ मेरी नानी के ईश्वर,कैसे नाम
के साथ शकल बदलता है इस जगह से उस जगह में
मैं भूलती हूँ उसे जानबूझ कर, इसे अनजाने में
फरिश्तों की रुहों को जो साथ लगी रहती हैं मेरे
बस भूल नहीं पाती हूँ कि किस किस को
भूलना चाहा है मैंने और कौन नहीं भुला पाया

नवम्बर 2014

…………….

मेरी चदरिया

 

उस सुबह ,  मेरी चदरिया में था

एक नन्हा सा छिद्र

मेरी नीन्द का परिणाम

 

दिन भर उलझती  रही मैं रेशमी धागों से

 

अगली नीन्द से पहले मेरे पास एक खिड़की थी

उनमें से घनाघोर घुसते सपने

 

अगले दिन फिर नया छिद्र ‘

इस बार  रेशम का साथ दिया रंगों ने

रात से पहले तैयार था एक दरवाजा

 

नीन्द को बहाना मिल गया

खिड़की झाँकने की जगह दरवाजे से निकल

रात- रात भर भटकने का

 

हर सुबह एक नए छिद्र के साथ आती रही

दुपहर रेशम, रंगो और कूंचियों में व्यस्त रही

 

अब मेरी चदरिया में विशाल आँगन, घना बरगद

बरगद पर परिन्दे, और परिन्दों की चोंच में लाल सितारे

 

सूरज चाँद अब भी दूर थे

 

मैं हर दिन खोजने लगी

नए नए छिद्र

 

बुन जाए जिसमें सूरज चाँद

इस आदम ब्रह्माण्ड के पार

 

अनेकों ब्रह्माण्डों के

 

अन्ततः में एक ऐसा छिद्र

जिससे निकल मैं समा जाऊ

छिद्र रहित आलोक में

 

My Sheet

 

That morning when I woke, I saw

a small hole in my sheet,

the result of being lost in sleep.

So I struggled with silken thread throughout the day

and by night had stitched a window

for glimpsing a few, new dreams.

 

The next day I woke to a new hole

and this time added paint to the thread.

Before dark I’d built a door.

 

My dreams could leave now and wander

instead of gazing out a window,

dreams freed to roam the entirety of the night.

Each morning brought new holes;

each day bustled with thread and paint.

 

Today my sheet is an enormous courtyard

with a banyan tree filled with birds with beaks like red stars,

though both sun and moon remain absent.

 

So I spend my mornings searching for holes

where a sun and moon might be woven,

not only in this galaxy

but also across

the many, layered others,

 

knowing at the end there’s a final hole

through which to exit

and join the great beyond

 

in a seamless realm of light.

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देहान्तर

 

सात मंजिल ऊपरी जमीन पर तलवे टिकाते ही

मैं उस ठंडक कर उतार कर रख देती हूँ

 

जो गोबर से लिपे आंगन से

मेरे साथ साथ चली आई है

 

स्वेटर की तरह पहन लेती हूँ, खिड़कियों,  अलमारियों

और दीवारों से घरे उस कमरे को

 

आसपास मेरी देह पर बेल की तरह चढ़ जाता है

 

एक घर से निकल कर दूसरे तक जाते हुए

पिछले घर के कुछ रेशे मेरी देह पर रह जाते हैं

 

मेरे दूसरे घर की दीवारे, धूप से बनी हैं

अंधेरे के साथ खो जाती हैं

 

इस घर को पहनना मेरे लिए

नीन्द सा सपनदार होता है

 

मैं सपने से हकीकत की और चलता शुरु करती हूँ

 

इस अन्तिम घर में मेरा इंतजार करता है

एक तकिया, बिस्तरे का एक हिस्सा

 

और दक्षिण की और खुलने वाली खिड़की

दक्षिण मृत्यु का घर है

मैं इसे अपनी देह बना कर अपने तकिए पर ले जाती हूं

 

 

The Body change

 

With my first step onto the seventh-story floor

I removed the coolness like a shoe

that I’d brought from the courtyard

painted with cow dung.

I donned the new room like a sweater

with windows, shelves, and walls,

the surroundings climbing my body like bougainvillea.

 

Whenever moving between homes

I carry bits of the old ones on my body.

 

The walls of the next home are made of sunlight

that disappears with darkness.

To put on this home

is to enter dreamfulness

as a road to reality.

 

At the final home, a pillow waits

on my side of a shared bed

beside a window facing south.

 

The south is the house of death.

I make it my body

and lie down on my pillow.

 

Now

I am ready.

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चीख

 

मेरे गले से निकली

चीख

नही पाती है जगह, जमीन पर,

अम्बर पर

तो

दुबक जाती है

मेरी  छातियों में,

मेरे उदर और जंघाओं में

मेरे गर्भाशय में

 

वे डर जाते हैं

मेरी चीख से

नाखूनों से

उधेड़ देते हैं  खाल

और निकाल  मेरे गर्भाशय को

गाड़ देते हैं

 

अब मेरा गर्भशय

इस जमीन पर

खड़ा होगा

बन जायेगा दरख्त

उगायेगा

करोड़ो चीखों को

 

नकली सभ्यता के किले की

चूले हिलाने के लिये

एक चीख मुकम्मिल  है

—————

बचा कर रख लेती थी, माँ

 

कैसी भी परिस्थिति में

किसी भी दुविधा में खाली नहीं होता था,

माँ का भण्डार, थोड़ा बहुत बचा कर रख लेती थी

तेल, अनाज, दाल या अचार

भड़िया में नमक के दानें, मर्तबान में गुड़

जी लेते थे सदियाँ, उस जादुई कोठरी में

सिम सिम कहे बिना, जिसमें से माँ निकाल ले आती थीं

थोड़ा बहुत जरूरत का सामान, किसी भी समय

 

माँ बचा कर रखती थीं, थोड़ा बहुत माँस

कमर और कूल्हों पर

एक के बाद एक जनमते सात बच्चों की

भूख  के लिये, जो नही कर सकती थी दुर्दिन का साक्षात्कार

और उन्हीं गुदगदे अहसासों पर

सोई सुख से  उसकी  अगली पीढ़ी

 

बचा कर रखती थी, वे किस्से कहानियाँ

अनजानी धुने, सपनों की सीढ़ियाँ

बच्चों के उन बच्चों के लिये, जो

बड़े होने तक ठिठके रहे नानी की कहानियों में

 

माँ ने आखिरी समय बचा कर रखी कुछ साँसें

बेटियों के मैका बनाये रख पाने  के लिये

पानी में पड़ी शक्कर की बोरी सी घुलती रही

और फिर छोड़ गई चासनी सी  मीठी अनगिनत यादें

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Mother Used to Save

 

At any moment,

under any conditions, the storehouse

of mother was never empty,

she saved oils, grains, pickles, beans,

salt in clay pots, glass jars of jaggery,

all of it living for centuries

in her magic storeroom, and available

in an instant

without a single “Open, Sesame!”

 

Mother saved flesh, too:

on her waist and hips, for her

seven hungry children, born

one after another,

and for the next generation:

to love grandma’s soft, sweet feel.

 

And she saved stories, myths,

unknown rhythms, steps

for the grandchildren’s dreams,

a way of keeping her with them

after she’s long gone.

 

In her final moments, her last

breaths left her daughters a home,

through which she keeps dissolving

like a sugar packet into water.

 

——————

 

Before leaving

 

close all the doors, one

by one,

 

hear them shut with a click,

pat each knob farewell,

 

and try never to promise to return,

not even by mistake,

 

don’t fret over who next

might pass through; each door

itself decides this

 

before leaving wipe away

each footprint

and fingerprint, no longer

needed by anyone,

 

before leaving, pack your things,

bundle every rusted story

 

and decorate the table with memories of laughter

 

before leaving, check every book,

throwing out the pressed flowers

dried in their pages

 

before leaving erase every line, break

open all the knots

 

and smile with strength

until life comes to sit

in the corners of your mouth

 

before leaving, close the final door,

and the rest will close themselves

 

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Dreaming in Another Land

 

He wanted her to smile

the dream of living in another land.

 

He wanted her to dance

like a melody on a violin’s strings.

 

He wanted to see in her lap

the milk-stained mouth of a sleeping child.

 

He looked after her

like day-old bread to be relished.

 

He was trying to save her

from the barbed wire

around Albania or Siberia

that bloomed like flowers from stone.

 

He loved her more than his country

but lost her far away like his dream,

 

the same as a young man

of his enemy country.

 

————

 

ये तो उसे बहुत बाद में पता चला

 

ये तो उसे बहुत बाद में पता चला कि

वह लड़की है, वह कभी अपने को

नदी समझती  तो कभी पहाड़ की चोटी

जब वह सिरसिर करके खिलखिलाती तो

उसे समझाया जाता कि वह लड़की है

उसे कुछ समझ आता, कुछ नहीं

 

जब मौका मिलता, अपने को जरा और उछाल देती

फिर किलकारती नीचे गिरती तो

लोग दंग रह जाते, लड़की हो या गिलहरी?

वह मजे मजे में फुदकती पेड़ पर चढ़ जाती

 

एक दिन वह सच में ऐसे देश पहुँचा दी गई

जहाँ दरख्त दर दरख्त थे, थी सागर सी नदी.

उसने भीतर झांक कर देखा, गिलहरी की हत्या हो चुकी थी

खिलखिल मछली चुप्पा गई थी, वह समन्दर को देखती रही

कि अपने भीतर से एक नौका निकाले और तिरा दे

और दीमक लगी लकड़ी  को निकाल फैंक दिया

 

वह लड़की चुप्पा गई. उसके मुँह में नई भाषा ठूंस दी गई

वह उसे अपना मान ही बैठी, उसके नाक से लेकर पाँव की उंगलीं में

कील ठोंक दी गई, वह दर्द से बेखबर हो गई

साल दर साल बीत गए, लड़की ना गिलहरी को भुला पाई

ना ही नदी की सरसराहट को

 

ये कहानी बहुत पुरानी है, और मेरा कागज एकदम कोरा

ना जाने कब लड़की  ने गिलहरी की जगह

बाघिन को पाल लिया,सिरसिराहट की जगह

वह चिंघाड़ने लगी, लोग पहले उसे लड़की नहीं मानते थे

और अब औरत कहने में भी डरने लगे

 

कहानी को आगे चलना चाहिये था, लेकिन

वह तो यहाँ तक आ कर रुक गई,

लड़की को यहां रुकना था, लेकिन लड़की

आगे चलती रही, बर्फीले पहाड़ों को पार कर

थार अथाह के अपरम्पार. चलती रही

 

और फिर एक दिन पार कर ली उसने जमीन

आसमान, और दरिया, फिर गुम हो गई

किसी दिशा में, लड़की थी ही ऐसी

कमबख्त हँसती रोती, क्या लड़कियाँ

ऐसी होती  है, लोगों ने फिर कहा

 

इस बार लड़की ने कुछ नहीं सुना

2015

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