समकालीन परिवेश में पोइट्री थेरापी‍ – पुरातनत्व से लेकर भविष्य तक प्रभाव

by रति सक्सेना

 

सभ्यता के अरुणोदय काल में ही मानव यह समझने लगा था कि उसके लिए अपने अस्तित्व को समझने के साथ अपने मन को समझना आवश्यक है,ऋ्ग्वेद में ऋषि कहता है-

 

न वि जा॑नामि॒ यदि॑वे॒दमस्मि॑ नि॒ण्यः संन॑द्धो॒ मन॑सा चरामि ।

य॒दा माग॑न्प्रथम॒जा ऋ॒तस्यादिद्वा॒चो अ॑श्नुवे भा॒गम॒स्याः ॥

ऋ्ग्वेद‍1,164,37

 

(नहीं जानता हूँ कि कौन हूँ मैं, मन में बोझ लिए मैं अकेले भटकता फिरता हूं, जब प्रथम उत्पन्न ऋत, यानी सत्य मेरे पास आता है तो मैं उसी संसार से अपना भाग ले लेता हूँ। )

फ्रांस के मशहूर दार्शनिक Rene Descartes    का भी कहना है

“Cogito ergo sum,” I think, therefore I exist -Rene Descartes

चिन्तन और उसके द्वारा सृष्टि में अपनी स्थिति को अन्य चराचरों की उपस्थिति में समझना मानव होने की प्रक्रिया है। चिन्तन की इसी प्रक्रिया के कारण मानव का अस्तित्व सृष्टि में बरकरार है। यही उसकी आत्मिक और भौतिक उन्नति का आधार है।

अक्सर हम ज्ञान के विकास के क्रम को पहचानने में भूल कर देते हैं। जैसे कि जब हम विज्ञान की बात करते हैं तो सीधे – सीधे यह सोच लेते हैं कि विज्ञान एक अलग विधा है, जो दर्शन के विरोध में निकल कर चली आई है, जबकि स्थिति यह है कि विज्ञान और दर्शन दोनों का एक ही मूल स्वभाव है, और वह है अपने को, अपने परिवेश को और समस्त गोचर- अगोचर को समझने बूझने की चाह। जैसे कि काल और स्थान  (Time & Space) के बारे में  दार्शनिकों और वैज्ञानिकों दोनों ने चिन्तन किया। एशियन दर्शन, विशेष रूप से वैदिक ऋचाओं और उपनिषदों में काल और स्थान सबसे अधिक अध्ययन का विषय रहा है। वहीं विज्ञान का मूल आधार ही पृध्वी, वातावरण के साथ अन्य खगौलीय नक्षत्र भी रहे हैं। शनैः शनैः दर्शन और विज्ञान के उद्देय और दिशा बदली, जहाँ दर्शन आत्मिक उन्नति और निर्वाण की ओर झुकने लगा, वहीं विज्ञान दैहिक और भौतिक विकास की और उन्मुख होने लगा।

मानव के अस्तित्व के लिए दोनों तरह के चिन्तक की आवश्यकता रही है। ईशोंपनिषद कहती है कि जो मनुष्य को दोनों तरह की विद्यायों यानी कि अविद्या और विद्या दोनों को सीखता है, वह मृत्यु को जीत कर अमृतत्व को पार कर लेता है, यहाँ अविद्या का अर्थ विद्या का अभाव नहीं, अपितु भौतिक विद्या है।

विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह।

अविद्यां मृत्यु तीर्त्वा विद्यां अमृतम अश्नुते।। ईश – 11

माडर्न फिजिक्स के अध्येताओं ने विज्ञान के साथ रहस्यात्मकता को भी समझने की कोशिश की है,”क्वान्टम थ्योरी ” और ” थ्योरी आफ रिलेटिविटी” के साथ इस बात को आइन्सटाइन ने तक ने कहा है ब्रह्माण्ड को समझने के लिए विज्ञान के साथ साथ  बहुत कुछ ऐसा रहस्यात्मक है, जिसे समझना उतना ही आवश्यक है। निसन्देह रहस्यात्मकता, दार्शनिकता का ही दूसरा रूप है। आइन्स्टाइन की थ्योरी आफ रिलेटिविटी और मिंकोस्की ( Minkowski’) की टाइम और स्पेस को हम दर्शन के काफी करीब पाते हैं।

एशियन संस्कृति में वैज्ञानिक अन्वेषण के लिए काव्य और विज्ञान का सम्मिश्रण अदभुत बात नहीं है। भास्कराचार्य द्वितीय (1150) ने गणित के लिए जो लीलावतीयम नामक ग्रन्थ लिखा था, वह काव्य रूप में था, जिसके बारे में कहा गया है कि लीलावतीयम जितना उच्च श्रेणी का गणित ‍-ग्रन्थ है, उतनी ही उच्च श्रेणी की काव्य ग्रन्थ भी है। उमर खैयाम जितने बड़े कवि थे, उससे कहीं बड़े गणितज्ञ, खगोल शास्त्र के अध्येता भी थे।

पाइथोगोरस ने कहा भी है ‍ “All things are numbers”. दरअसल गणित और दर्शन मिलकर ही ब्रह्माण्ड की गुत्थियां सुलझा सकते हैं।  Gottfried Wilhelm Leibniz (b. 1646, d. 1716) जो जर्मन दार्शनिक और गणितज्ञ थे,  ने कहा भी है कि – किसी भी तर्क को साबित करने के लिए उसे उतना मूर्त बनाना होता है, जितना की गणित है, जिससे त्रुटियों  पर तुरन्त ध्यान जाये। जिससे जब भी कोई विवाद हो,  हम उसे गणित की तरह साबित कर सकें। (The only way to rectify our reasoning is to make them as tangible as those of the Mathematicians, so that we can find our error at a glance, and when there are disputes among persons, we can simply say: Let us calculate without further ado, to see who is right.)

Fritjof Capra (The Relationship between Science and Spirituality  By Fritjof Capra on Monday February 15th, 2016) ने कहा है कि‍ जब हम अपने आस पास और सृष्टि पर दृष्टि डालते हैं तो पाते हैं कि यहां कुछ ना कुछ निरन्तरता और अन्तर्सम्बन्धता है, यहाँ अराजक कुछ भी नहीं है।

इसी तरह मानव देह में भी सूक्ष्म अन्तरसम्बन्ध है, और हर अंग को अलग अलग मशीन के रूप में नहीं देखा जा सकता है, सब में जो अन्तर्सम्बन्ध है उससे ऊपर कोई सूक्ष्म भाव है जो सबको जोड़े रखता है़ |

मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि ना केवल सृष्टि और ब्रह्माण्ड को अपितु मानव देह सम्बन्धी समस्याओं को समझने के लिए भी विज्ञान के साथ साथ दर्शन को भी समझना जरूरी है। आज स्थिति यह है कि विज्ञान की भी हजारों शाखाएं हो गई हैं, हर क्षेत्र के लिए भिन्न शाखाएँ निर्धारित कर दी गईं है। चिकित्सा विज्ञान की भी सैंकड़ो शाखाएं बना दी गई हैं। देह को ब्रह्माण्ड का संक्षिप्त रूप माना गया है, उसमें भी अनेक रहस्यात्मक तत्व हैं, जिन्हे् मनोविज्ञान के नाम पर समझने की कोशिश की जाती है। लेकिन परा और अपरा को साथ लेकर चलने की कोशिश कम की जाती है।

यदि हम अथर्ववेद के चिकित्सा सम्बन्धी मन्त्रों का अध्ययन करें तो एक विशेष बात देखने को मिलती है कि कवि यानि कि चिकित्सक औषध के साथ साथ ऋचा पाठ भी करता है, जो कभी विभिन्न देवों के नाम कभी मृत्यु के नाम या फिर कभी औषधि विशेष  को संबोधित होती  है़,आखिरकार ये चिकित्सक अपने रोगियों को औषधि तो दे ही रहे होंगे, जिनकी जानकारी हमें मन्त्रों में नहीं मिलती है। संभवतया चिकित्सा की पद्धति जो मन्त्रों के साथ उपयोग में लाई जाती होगी, काल के साथ लुप्त हो गई़।

मन्त्र का अर्थ है मनन,  अतः मन्त्र के प्रयोग  से यह सूचना मिलती है कि औषध के साथ प्रार्थना का भी प्रयोग किया जाता है। प्रार्थना में शब्द और अर्थ के साथ साथ भावना का भी सम्मिश्रण होता है।  यही कविता का का मूल रूप है।

जल, वनस्पति, बादल, सागर, नदी ताल, सभी तत्व जहाँ विज्ञान की दृष्टि से उपयोगी हैं वहीं दर्शन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है़। महत्वपूर्ण बात यह है कि इन सभी कों काव्य और साहित्य का विषय भी बनाया गया है। यदि संक्षिप्त में कहा जाए तो कहा जा सकता है कि दर्शन और विज्ञान का अन्तर्गत सूत्र है।

हम विश्व की मूलवासी समाज में भी कुछ ऐसे प्रयोग देख सकते  हैं, जिनमें चिकित्सा को गेयता और काव्यात्मकता के साथ प्रस्तुत किया गया है। चाहे वह अफ्रीकन संस्कृति हो या फिर नेटिव अमेरिकन संस्कृति हो। यही नहीं हम आज भी लोक कलाओं में इन प्रयोगों को देखते हैं। नेटिव अमेरिकनों के समाज में आज भी यह प्रथा पुनर्जीवित की जा रही है। प्रसिद्ध शामनिक चिकित्सा प्रणाली भी मन्त्र वाचन और गेयता के साथ प्रयोग की सिफारिश करता है। लोक में प्रचलित अनेक नृत्य नाट्य और गीत कलाएं हैं जिन्हें आज भी चिकित्सा से जोड़ कर देखा जाता है, जैसे कि जैसे कि केरल का पडयनी, सर्पम कालम आदि लौकिक अभिचार लोक में औषधीय प्रभाव के हेतु किये जाते थे।

यदि हम विभिन्न धर्मों पर दृष्टि डाले तो वे प्रार्थनाएं जिनमें आरोग्य या दुख से निवृत्ति की कामना की गई हैं, उच्च कोटि की कविताएं है। चाहे वो किसी धर्म से जुड़ी हो । हिन्दु धर्म में तो प्रार्थनाओं का आदिम काल से इतिहास है, और सन्तों ने सकार और निराकार दोनों तरह की भक्त को श्रेष्ठ कविता के माध्य से प्रस्तुत किया है। सूर रसखान, मीरा,तुलसी जहां पर सकारात्मक कविता द्वारा दुख हरण की याचना करते हैं, वही कबीर , नानक, आदि निराकार से भी प्रार्थना ही करते हैं। आज भी लौकिक आचारों में भव बाधाओं से दूर होने के लिए प्रार्थनाओं और मन्त्रों का बहुत महत्व है।

सर्वे भवन्तु सुखिनः

सर्वे सन्तु निरामयाः।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु

मा कश्चिद् दुःख भाग्भवेत् ।

जैसी वैदिक प्रार्थना ही हिन्दु धर्म का मूलाधार है।

इस सम्बन्ध में हमें अनेक उदाहरण अपने आस पास ही दिखाई दे जाते हैं। इस्लाम में सूफी सम्प्रदाय दैहिक समस्या निवारण के लिए जिन काव्य प्रयोगों का पालन करता था, वह जगत्प्रसिद्ध है, रुमी अपने सूफी कलामों के लिए जगत् प्रसिद्ध हैं। बाइबिल में में The book of Samuel में  King Saul का उल्लेख है, जो किसी शैतान आत्मा के प्रवेश करने के कारण कष्ट में आ गये। उसके मन की शान्ति के लिए डेविड नामक गड़रिये को हार्प बजाने के लिए बुलाया गया। हार्प की ध्वनि से शैतान ने उसे छोड़े दिया। [ (1 Samuel: 16: 14-23)].

 “But He was wounded for our transgressions,

He was bruised for our iniquities;

The chastisement for our peace was upon Him,

And by His stripes, we are healed[ (Isaiah 53:5)

 

प्रार्थना की शक्ति को ईसाई धर्म ने पूरी तरह से स्वीकार किया है

“Our prayers may be awkward. Our attempts may be feeble. But since the power of prayer is in the one who hears it and not in the one who says it, our prayers do make a difference.[ (Psalm 147:3)]”

बौद्ध धर्म का वह विभाग जो भारत से बाहर जाकर Zenism में परिवर्तित हो गया था, प्रार्थना की शक्ति को पहचानता है। दरअसल अधिकतर Zen दार्शनिक उच्च कोटि के कवि भी रहे हैं।

मैंने इस विषय में कुछ समकालीन कवियों से सम्वाद किया और यह पाया कि किस तरह से विषम स्थितियों में कविता ने  उनकी मदद की। वैसे हम पाते हैं कि अनेक  मध्यकालीन कवियों ने अपने दुखों से निजात पाने के लिए ही कविता का आसरा लिया़ और श्रेष्ठ दार्शनिकों में गिने जाने लगे। लल्द्यत, रूप भवानी , हब्बा खातून, अक्का महादेवी आदि अनेक नाम गणनीय हैं।

मैंने कुछ कवियों से संवाद किया, जो विविध समस्याओं, व्याधियों से बाहर निकले।सबसे पहले  में चीनी मूल के अमेरिकन वासी कवि Koon Woon  का उल्लेख करूंगी, जो schizo affective-bipolar नामक मानसिक बीमारी से ग्रसित थे। उन्हें शीघ्र ही महसूस हुआ कि उन्हें  स्वयं भी इस बीमारी से बाहर निकलने की कोशिश करनी पड़ेगी। यही समय था जब कू वून ने कविता लिखनी शुरु कर दीं। हालांकि वे कहते हैं कि बीमारी के कारण विचार  स्थिर नहीं थे। लेकिन वे दवाओं के साथ साथ कविता भी लिखने की कोशिश करने लगे, धीरे धीरे उन्हें कवि के रूप में पहचान मिलने लगी और उनका आत्मविश्वास बढ़ता गया। बीस साल की अवस्था में हुई बीमारी से निजात सत्तर साल की उम्र तक नहीं मिली। दो तीन किताबें छप चुकीं हैं। पुरस्कार के साथ नाम भी हुआ है, वे अच्छी तरह से समझ चुके हैं कि कविता का  किस तरह से थेरापी का प्रयोग किया जा सकता है।

कुछ ऐसी ही स्थिति  इस्टोनिया के Margus Lattik- (Estonia) का था, उन्हें घोर बचपन में एक बांह में कैंसर हो गया था, जिस कारण से उन्हे लम्बे काल तक अस्पताल में रहना पड़ा। उनकी एक बांह काट दी गई। लेकिन आज वे एक सफल अन्तर्राष्ट्रीय कवि हैं। बचपन के अवसाद ने उन्हे कविता की ओर ढ़केला, लेकिन कविता ने उन्हे शोहरत और सम्मान दिलवाया।

एलिसिया पार्टनोई की कथा तो बेहद अलग है, वे अर्जेन्टीना मूल की हैं जो अमेरिका में रहती  हैं। जब वे 21 वर्ष की थी, तब अर्जेन्टीना के राष्ट्पति  Juan Domingo Perón की मृत्यु के बाद सैन्य तख्तापटल हो गया, और देश के युवाओं को गुप्त रूप से यातना शिविरों में भेज दिया गया। एलिसिया भी इसी तरह के यातना शिविर में भेजी गई, और उनकी डेढ़ साल की बच्ची को लावारिस छोड़ दिया गया। एलिसिया ने पूर्ण रूप से कवि कर्म तो नहीं अपनाया, क्यों कि सम्भव ही नहीं था, लेकिन बाल गीतों द्वारा अपने मन को थामती रहीं। बाद में जब उन्हें जेल भेजा गया तो उन्होंने अपनी बेटी के नाम कविताएं लिखी। लेकिन सबसे बड़ी बात उसके उपरान्त हुई जब उन्होंने अपने अनुभवों को कविता और लेखों में बांधना शुरु किया तो तानाशाह को सजा दिलवाने में गवाह बनीं, यही नहीं उनके विवरणो ने कई अन्य खोये हुए  लोगो से मिलवाया। आज भी उनका कवितामय संघर्ष सम्माननीय है।

Miklós Radnóti (1909-1944) की पोस्टर कविताए मशहूर है जो उन्होंने  1937 में  ‘Cartes Postales’ (Postcards from France) के नाम से लिखी थीं। वे युगोस्लावियां के यातना शिविर  में थे, एक स्थान से दूसरे स्थान पर अन्य कैदियों के साथ ले जाये जा रहे थे, तो उन्होंने अपनी स्थिति कागज के पुर्जों पर लिखनी शुरु कर दी, यात्रा के दौरान ही उनको मार दिया गया। ओर गड्डा खोद कर दफना दिया गया, लेकिन युद्ध के बाद उनके शव के उपर उनके हाथ से लिखी वे कविताएं थी। मैं कुछ उदाहरण दे रही हूँ..

Postcard 1

by Miklós Radnóti

Written August 30, 1944

Translated by Michael R. Burch

 

Out of Bulgaria,

 the great wild roar of the artillery thunders,

resounds on the mountain ridges, rebounds,

then ebbs into silence

while here men, beasts,

wagons and imagination all steadily increase;

the road whinnies and bucks,

neighing; the maned sky gallops;

and you are eternally with me, love,

constant amid all the chaos,

glowing within my conscience – incandescent, intense.

Somewhere within me, dear, you abide forever -

still, motionless, mute,

 like an angel stunned to silence by death

or a beetle hiding in the heart of a rotting tree.

 

Postcard 2

by Miklós Radnóti

written October 6, 1944 near Crvenka, Serbia

Translated by Michael R. Burch

 A few miles away they’re incinerating

the haystacks and the houses,

while squatting here on the fringe of this pleasant meadow,

the shell-shocked peasants quietly smoke their pipes.

Now, here, stepping into this still pond, the little shepherd girl

sets the silver water a-ripple

while, leaning over to drink, her flocculent sheep

seem to swim like drifting clouds.

 

से ही Yala Helen Korwin िनका जन्म February 7, 1933 में पोलेण्ड में हुआ था, बचपन में वे जर्मनी के नाजी केम्पों में रही, बाद में फ्रांस में शरणार्थी की तरह भेज दीं गईं।  1956  में वे अमेरिका आईं. और 1987 में उन्होंने होलोकास्ट पर कविताएं लिखीं। उनकी प्रसिद्ध कविता है “The Little Boy with His Hands Up” जिस पर फिनलैण्ड में डाक्यूमेन्टरी भी बनी थी।

इसी तरह आज तिब्बत के लिए संघर्ष करने वाले युवक, विशेष रूप से Tenzin Tsundue अपनी बात भाषणों के माध्यम से नहीं बल्कि कविता के माध्यम से पेश करते है़्। विश्व के प्रसिद्ध काव्य समारोह  मैडिलिन पोइट्री फेस्टीवल का  आधार वह कठिन  परिस्थिति थी, जिसमें पूरी आवाम समस्या ग्रस्त थी। यह इलाका  अमेरिका द्वारा प्रक्षेपित ड्रग की समस्या से इतना ग्रसित था कि जन सामान्य का घर से निकलना भी मुश्किल था। दिन दहाड़े मार काट हत्याएं होती थीं, ऐसी कठिन स्थिति में कुछ युवकों नें पार्क में बैठ कर कविता पाठ शुरु कर दिया, और धीरे धीरे लोग जुड़ते गये, दरअसल कविता पाठ उन्हें प्रार्थना की तरह लगा। आज भी यहां के काव्योत्सव में हजारों की संख्या में लोग उपस्थित होकर कविता सुनने आते हैं।

हमने कृत्या फेस्टीवल के माध्यम से कुछ ऐसे प्रयोग करने चाहे, हम अपने अन्तर्राष्ट्रीय कवियों को अस्पताल, जेल, वृद्धाश्रम आदि लेकर गए। यहां दो तरफा प्रभाव देखने को मिला । कवि, जो अक्सर  दुखद स्थितियों का वर्णन करते हैं, उनमें से कितने हैं जो उनका हिस्सा बन पाते हैं| जब हम कवियों के साथ इन स्थानों में पहुँचे तो उन्हें उन लोगों से रूबरू हो कर अलग अहसास हुआ, जिनके बारे में  वे लिखते रहते हैं। दूसरी ओर जो प्रेक्षक थे, वे कवियों से जुड़ रहे थे, उन्हे सुन रहे थे तो वे भी उनका ही हिस्सा बनने लगे। केरल की जेलों की स्थिति काफी बेहतर है। यहां जेल में बना खाना और अनेक चीजों का व्यापार किया जाता है, जिसका धन उनकी हालत को सुधारने में मदद करता है। लेकिन मुझे हमेशा लगता था कि इन कैदियों को ऐसे लोग भी मिलने चाहिये जो उनके मन को थामें, उनकी भावनाओं को विकसित होने के लिए उकसाए, क्यों कि कोई भी जब  तक मन में आलोक नहीं भरेंगे , उनके कर्म में खास परिवर्तन नहीं होगा।

 

अस्पताल के अलग अनुभव होते हैं, यूरोंप के अनेक देशों में कविता थेरोपिस्ट की नियुक्ति भी होने लगी हैं, जो अस्पताल में रोगियों के पास जाते हैं, उन्हे कुछ सुनाते हैं, कुछ लिखने को प्रेरित करते हैं, इससे वे अपने रोग को एक नये तरीके से देखने लगते हैं, यही नहीं उनका मन कुछ समय के लिए अपने दैहिक कष्ट से भटक सकता है। हमने कृत्या में ऐसे कई प्रयोग किए, और उसका सकारात्मक प्रभाव देखने को मिला।

मेरी पुस्तक में इन सभी अनुभवों को समेटा है। साथ ही कविता थेरोपी का किस तरह से उपयोग किया जाए, कौन थेरोपिस्ट बन सकता है के बारे में भी चर्चा की हैं।

यह विषय पुस्तकालय हेतु नहीं अपितु प्रयोगात्मक रूप में उपयुक्त है।