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https://publiknama.com/2020/11/07/a-soul-in-the-well/?fbclid=IwAR0iMsFvqiE8eJHhf8qJyJfKi22ZUPFTparLjvxgutAR59I3pEqAxVW0gjc     https://publiknama.com/2020/11/07/a-soul-in-the-well/?fbclid=IwAR0iMsFvqiE8eJHhf8qJyJfKi22ZUPFTparLjvxgutAR59I3pEqAxVW0gjc      

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स्त्री देवी से शूद्रा तक

इतिहास और साहित्य दोनो में थोड़ा बहुत प्रवेश होने के कारण मुझे हमेशा लगता रहा है कि हमारे पुरातन परंपरा  में इतिहास में साहित्य और साहित्य मे इतिहास का बड़ा अजीब सा घालमेल है। अधिकतर हम साहित्य में इतिहास और इतिहास मे साहित्य खोजने की भूल कर बैठते हैं, पुराणों में लिखा गया अधिकतर साहित्य की मिथक परंपरा में आता

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जुले लद्दाख ( Part-5) By Rati Saxena

आज यात्रा काफी जल्दी शुरू हो गई क्यों कि हमे सुदूर पर्वतों में बसी पैंगाग स्तो यानी की झील देखने जाना था।  करीब छह बजे हमे डेरे से निकलना था। आज की यात्रा में किरण औरसंजीव के साथ उनका चार साल का गोलमटोल बेटा गोलू भी था। गोलू पर्वतीय माता पिता का बेटा है तो चेहरे पर पर्वतीय भोलापन तो

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जुले लद्दाख – ( Part 4) By Rati Saxena

अगले दिन हमे जल्दी निकलना था, क्यों कि यह जरा लम्बी यात्रा थी। कई मील की दूरियों पर बसे कुछ गोम्फाओं की यात्रा थी। रास्ते भर पहाड़ों के चेहरे मोहरे, तरह तरह की भावभंगिमाएँ देख मन खुश होता रहा। हर जगह नया नजारा, पहाड़ के इतने रूप भी हो सकते हैं मेरी कल्पना के परे था। पहाड़ न हो गए,

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जुले लद्दाख – Part-3 by Rati Saxena

अगला पड़ाव था “स्तोक पैलेस” । यह लेह राज महल है जिसका एक हिस्सा सैलानियों के लिए खोल दिया गया है। इसे 17 वी सदी में राजा सिग्गे नंगियाल के लिए बनवाया गया था, बाद में 1830 में राजपरिवार इसे छोड़ कर स्तोक में बसना पड़ा। यह नंगियाल पहाड़ी पर बना हुआ है। आम राजमहलों की तरह इसके  अन्दर जाने

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जुले लद्दाख by Rati Saxena ( Part -two)

आज हम लोगों को कैद से मुक्ति मिल गई, आज तीसरा दिन था और हम लोग लेह के आसपास के इलाके में घूमने के लिए आजाद थे। टैक्सी बुलवा दी गई थी, लेह में टैक्सी की रेट काफी ज्यादा है, उनकी यूनियन ने जो किराया निश्चित किया है वह शायद डालर के हिसाब से किया है। भारतीय पर्यटकों को याद

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जुले लद्दाख   By Rati Saxena ( Part-1)

21.6.2006   सुबह- सुबह की उड़ान पकड़ने का सीधा मतलब होता है,यात्रा से पहले वाली रात की नीन्द की बलि, यही हुआ उस दिन जब हम त्रिवेन्द्रम से दिल्ली पहुँचे, तो रात के करीब दस बज चुके थे।   लेह की फ्लाइट पकड़ने सुबह सवेरे पाँच बजे तक  हवाई अड्डे पर पहुँचना  था। परिणाम यह हुआ कि सीट की बेल्ट बाँधते

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समकालीन परिवेश में पोइट्री थेरापी‍ – पुरातनत्व से लेकर भविष्य तक प्रभाव

by रति सक्सेना   सभ्यता के अरुणोदय काल में ही मानव यह समझने लगा था कि उसके लिए अपने अस्तित्व को समझने के साथ अपने मन को समझना आवश्यक है,ऋ्ग्वेद में ऋषि कहता है-   न वि जा॑नामि॒ यदि॑वे॒दमस्मि॑ नि॒ण्यः संन॑द्धो॒ मन॑सा चरामि । य॒दा माग॑न्प्रथम॒जा ऋ॒तस्यादिद्वा॒चो अ॑श्नुवे भा॒गम॒स्याः ॥ ऋ्ग्वेद‍1,164,37   (नहीं जानता हूँ कि कौन हूँ मैं, मन

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वेद में वैज्ञानिकता

by डा. रति सक्सेना——   अक्सर हम ज्ञान के विकास के क्रम को पहचानने में भूल कर देते हैं। जैसे कि जब हम विज्ञान की बात करते हैं तो सीधे सीधे यह सोच लेते हैं कि विज्ञान एक अलग विधा है, जो दर्शन के विरोध में निकल कर चली आई है, जबकि स्थिति यह है कि विज्ञान और दर्शन दोनों

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